नारी का करता मान सदा, मैं भारत का नवयुवा हूँ
सनातन पावन धरा नमन, मर्यादा का मैं स्वर हूँ
त्याग तपस्या जीवन मेरा, धर्म पथों का पथिक बना
अन्यायों के तम को हरने, दीपक सा मैं जलता हूँ
पत्नी रक्षा हित रघुनंदन, लंका सिंहासन डोल गया
अधर्मी रावण धरती पर, क्षण भर में ही बोल गया
मर्यादा की ज्योति लिए, अयोध्या पथ मैं चल पड़ा
धर्म की राह दिखाने को, फिर से राम ही बन खड़ा
बाणों की शय्या पर सोकर, व्रत को कभी न तोड़ा है
भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा, जीवन भर मैंने जोड़ा है
कुरुक्षेत्र की धूल बता दे, क्या होता है धर्म महान
मृत्यु को जिसने गले लगाया, वही बना इतिहास महान
हनुमान-सा बल मेरे अंदर, अन्यायों से टकराता हूँ
शिवाजी बन, संभाजी बन, हर अत्याचारी मिटाता हूँ
मुगलों के अत्याचारों पर, वज्र बनकर मैं गिरता हूँ
भारत माँ की रक्षा खातिर, हर रण में आगे बढ़ता हूँ
फाँसी के फंदे को चूम, हँसते-हँसते झूल गया
इंकलाब की गूँज बना, रक्त मेरा भी फूल गया
भगत सिंह की ज्वाला बनकर, हर दिल में मैं जलता हूँ
देश भक्ति की आग लिए, रण में कूद मचलता हूँ
दानवीर कर्ण-सा देता, अपना सब कुछ त्याग दिया
मित्र धर्म की खातिर मैंने, अपनों से भी युद्ध किया
सूर्य समान तेजस्वी मैं, कुंती का वह लाल बना
संकट में जो अडिग खड़ा हो, ऐसा अटल मिसाल बना
शिव तांडव की गर्जन बन, कैलाशों को भी हिलाता हूँ
भक्त बनकर महादेव का, शीश चढ़ाकर आता हूँ
एक नहीं सौ जन्म लगें तो, फिर भी ऋण उतरे ना
भोलेनाथ की कृपा बिना, जीवन सच्चा बने ना
द्रौपदी की लाज बचाने, गीता का उपदेश दिया
धर्म युद्ध के रण में आकर, सत्य का संदेश दिया
लक्ष्मण बन त्याग किया मैंने, राजमहल भी छोड़ दिया
भाई धर्म की खातिर मैंने, वन से नाता जोड़ लिया
जब-जब भारत संकट में हो, मैं ही आगे आता हूँ
सीना तान खड़ा हो जाता, दुश्मन को ललकारता हूँ
जीत अगर मैं ठान लूँ तो, काल भी मुझसे हारा है
हाँ मैं युवा, पुरुष वही हूँ, जिसने इतिहास संवारा है
✍️कवि लीलाधर सिन्हा |भंडारपुर खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)

