इच्छाओं का कीडा झुलस रहा है मेरे भीतर। ना ही उस का कोई स्पष्ट चेहरा है ना ही इच्छा पूर्ति की कोई सूची।
क्यूँ रेंग रहे हो मेरे अंदर ? जितना जितना तुम फैलते हो , उतने कांटे गड़ते है मेरे भीतर। निर्वाण के रस्ते में , आखिर क्यूं बाधा बने बैठे हो ?
कोई हंसी , ठिठोली की आवाज़ सुनाई दी मुझे। मैं , अमीबा के सृजन समय से अस्तित्व में हूं। जितना मिटाना चाहोगी , मेरी आयु और बढ़ती जाएगी।
सहमी हुई मैं .. तुम्हारी वजह से ही मैं एक किताबी कीडा बन चुकी हूं। ये शब्दों का ग्रंथालय , कम स कम , मेरे लिए रेशम की चादर तो बुन देता है।
थोड़े नर्म लहज़े में फिर कहा मैंने, मेरी व्यक्तिगत निजी कोई इच्छा नहीं। तुम तो इच्छाधारी कोई नाग हो , मुक्त करो मुझे अपने साम्राज्य से।
देखो मेरे पास , मन की अनंत पृष्ठभूमि है। Ha ha ha .. जो फैली है तुम्हारे ही अंदर। ये ऐसी कॉस्मिक पहेली है , जिस का कोई उत्तर ही नहीं। जाओ तुम्हारे ग्रंथालय से , रेशम की चादर बुनती रहो।
या मृत्यु के द्वार पर चातक की तरह , प्रतीक्षा करती रहो, स्वाति बिंदु सब स्वाहा कर देंगे , एक दिन।।



1 Comment
धन्यवाद चैतन्य 😊❤️
मेरे पास शब्द नहीं है, प्रतिक्रिया के लिए 😔❤️