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    पक्का बना मकान – डॉ. सरोज दुबे ‘विधा’

    sahitya36garh 01By sahitya36garh 01May 29, 2026Updated:May 29, 2026 आज की कविता No Comments1 Min Read
    डॉ सरोज दुबे 'विधा'
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    बरसों पुराने कच्चे घर की आखिरी खपरेल आज उतर रही थी। रामदयाल आँगन में खड़े नए पक्के मकान को गर्व से देख रहे थे। चमचमाती टाइलें, ऊँची दीवारें और लोहे का बड़ा फाटक सब कुछ वैसा ही था जैसा उन्होंने शहर से लौटे बेटे की इच्छा पर बनवाया था।
    गाँव वाले देखने आते और तरीफ़ करते,–“वाह अब तो शहर जैसा घर बन गया।”
    लेकिन रामदयाल की आँखें बार-बार सूनें आँगन पर टिक जातीं। कभी इसी आँगन में शाम ढले पड़ोसी जुटते थे, बच्चे हँसते थे, और चूल्हे की आँच पर रिश्ते पकते थे। अब बेटा ऊपर वाले कमरे में मोबाईल पर व्यस्त रहता, बहू दरवाज़ा बंद रखती और पोता दादा से ज्यादा पालतू कुत्ते से खेलता।
    रामदयाल नें पुराने नीम के कटे ठूँठ को सहलाते हुए पत्नी से कहा,–“घर तो पक्का हो गया पर रिश्ते कच्चे रह गए।”

    डॉ सरोज दुबे की एक और रचना पढ़ने के लिए क्लिक करें ”मंच का मापदंड” : डॉ सरोज दुबे

    डॉ सरोज दुबे ‘विधा’
    रायपुर छत्तीसगढ़

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    sahitya36garh 01
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