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    बशीर बद्र सिर्फ़ शायर नहीं,रिश्तों की नरम धूप हैं : बीना

    sahitya36garh 01By sahitya36garh 01June 16, 2026Updated:June 19, 2026 खबर साहित्य No Comments3 Mins Read
    Bashir badra
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    बशीर बद्र सिर्फ़ शायर नहीं,रिश्तों की नरम धूप हैं।उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।कुछ लोग किताबों में दर्ज होते हैं। कुछ लोग इतिहास में। और कुछ ऐसे होते हैं जो लोगों की रोज़मर्रा की बातचीत, प्रेम, विरह, तन्हाई और यादों में बस जाते हैं।डॉ. बशीर बद्र ऐसे ही शायर थे।उनके जाने की खबर सुनकर ऐसा नहीं लगा कि कोई शायर चला गया है। ऐसा लगा जैसे हमारी भाषा का एक बेहद मुलायम, बेहद आत्मीय कोना अचानक थोड़ा सूना हो गया हो। वे उन विरले शायरों में थे जिनकी शायरी साहित्यिक मंचों से निकलकर आम लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन गई थी।

    बशीर बद्र ने प्रेम को भी लिखा, तन्हाई को भी, रिश्तों को भी और इंसानी दर्द को भी। मगर उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे कठिन से कठिन अनुभूति को भी बेहद सरल शब्दों में कह देते थे।उनका एक और कालजयी शेर .. दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।यह केवल एक शेर नहीं, मनुष्यता का घोषणापत्र है। ऐसे समय में जब लोग विचारों, धर्मों, सीमाओं और मतभेदों के नाम पर एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं, बशीर बद्र का यह शेर पहले से अधिक प्रासंगिक लगता है।

    बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उसमें शिकायत कम और समझ अधिक थी। दर्द था, मगर कटुता नहीं। विरह था, मगर निराशा नहीं। अकेलापन था, मगर जीवन से मोहभंग नहीं।उन्होंने जीवन में निजी त्रासदियाँ भी देखीं। मेरठ की सांप्रदायिक हिंसा में उनका घर, पुस्तकें और वर्षों की मेहनत नष्ट हो गई, फिर भी उनकी शायरी में मनुष्यता के प्रति विश्वास बना रहा।

    आज जब हम उन्हें याद करते हैं, तो केवल एक शायर को नहीं, बल्कि उस दृष्टि को याद करते हैं जो मनुष्य को उसके सम्पूर्ण प्रकाश और सम्पूर्ण अंधकार के साथ स्वीकार करती थी।उनके अशआर पढ़ते हुए अक्सर लगता है, कि कोई बुज़ुर्ग, मुस्कुराते हुए, ज़िंदगी का सबसे कठिन सबक दो आसान पंक्तियों में समझा गया हो।

    शायर चले जाते हैं।लेकिन कुछ आवाज़ें समय से बड़ी हो जाती हैं।बशीर बद्र उन्हीं आवाज़ों में से एक हैं।वे आज भी किसी पुराने ख़त में हैं। किसी अधूरी मोहब्बत में हैं। किसी तन्हा शाम में हैं। किसी चाय की मेज़ पर हैं। और उन तमाम दिलों में हैं जिन्होंने कभी प्रेम किया, खोया, प्रतीक्षा की या याद किया।उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।”कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।”अलविदा बशीर साहब।

    credit : beena beeing (poet)

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