अमृता सिर्फ शब्द नहीं लिखती थीं, वे अपनी आत्मा की राख में उँगलियाँ डुबोकर वाक्यों को जन्म देती थीं। उनकी भाषा में प्रेम कोई उत्सव नहीं था, वह एक अधजला चिराग था , जो रात भर धुआँ देता रहा,पर बुझा नहीं।उन्होंने स्त्री को कविता की सजावट नहीं बनाया,बल्कि उसकी चुप्पियों के भीतर छिपे सदियों के विरह को आवाज़ दी। उनकी हर पंक्ति में एक ऐसी औरत सांस लेती है,जो टूटती भी है, प्रेम भी करती है, और फिर अपनी ही राख से धीरे-धीरे पुनः जन्म लेती है।
अमृता की कविताएँ .. किसी नदी के किनारे रखे उस दीपक जैसी लगती हैं, जिसे हवा बुझाना भी चाहती है और बचाना भी। उनके शब्दों में मोहब्बत सिर्फ किसी पुरुष का नाम नहीं , एक पूरा मौसम थी ❤️ जो देह से शुरू होकर रूह तक बरसता था। उन्होंने प्रेम को इबादत की तरह ही नहीं जिया, बल्कि एक ऐसे ज़ख्म की तरह छुआ, जिसकी टीस भी प्रिय लगती है।उनकी कलम जब चलती थी, तो लगता था कोई स्त्री अपनी सदियों पुरानी चुप्पी धीरे-धीरे खोल रही है, और हर अक्षर के साथ एक कैद पंछी आसमान याद कर रहा है।
साहिर , अमृता की ज़िंदगी में किसी मुकम्मल प्रेम की तरह नहीं आए थे। वे उस धुएँ की तरह आए,जो कमरे में देर तक ठहरता है और फिर भी हाथों में नहीं आता। कहते हैं, जब साहिर जाते थे,तो उनके आधे बुझाए हुए सिगरेट के टुकड़े अमृता संभाल कर रख लेती थीं , जैसे कोई औरत किसी आवाज़ की बची हुई गर्मी अपने हाथों में छुपा ले।उनका प्रेम मिलन से ज़्यादा प्रतीक्षा था। एक लंबा, शांत विरह,जिसमें शब्द एक-दूसरे को छूते थे।
साहिर की खामोशियाँ अमृता की कविताओं में उतरती रहीं,और अमृता का प्रेम साहिर की अधूरी नज़्मों में भटकता रहा। वे शायद एक-दूसरे के लिए बने नहीं थे, पर एक-दूसरे के बिना पूरे भी कहाँ थे।कुछ प्रेम कहानियाँ घर तक नहीं पहुँचतीं,वे बस उम्र भर रूह के किसी कोने में धीमी आँच की तरह जलती रहती हैं। इमरोज़ , अमृता की ज़िंदगी में तूफ़ान बनकर नहीं आए थे। वे उस शांत शाम की तरह आए,जिसमें कोई धीरे से थके हुए माथे पर हाथ रख दे। साहिर अमृता की अधूरी प्यास थे,पर इमरोज़ उनकी थकी हुई रूह का विश्राम।कहते हैं, जब इमरोज़ स्कूटर चलाते थे, तो पीछे बैठी अमृता उनकी पीठ पर उँगलियों से“साहिर” लिखा करती थीं। और इमरोज़ मुस्कुरा कर हवा में वह नाम बह जाने देते थे।कितना विराट प्रेम रहा होगा , जहाँ एक पुरुष स्त्री के अतीत से भी ईर्ष्या न करे, बल्कि उसे भी अपने प्रेम में जगह दे दे।
इमरोज़ ने अमृता को कभी बाँधना नहीं चाहा, उन्होंने बस उनके चारों ओर एक ऐसी ख़ामोश मोहब्बत बुन दी,जिसमें अमृता आख़िरकार सांस ले सकीं।उनका प्रेम शब्दों से कम, उपस्थिति से ज़्यादा बना था। जैसे कोई दीपक पूरी रात बिना आवाज़ के जलता रहे। और शायद हर औरत की रूह ज़िंदगी में एक साहिर से गुजरती है। लेकिन उसे घर किसी इमरोज़ के पास ही मिलता है। 🌻अमृता ❤️जो धुएँ से गुज़रते-गुज़रते आख़िरकार धूप तक पहुँची।
समालोचक : ✍️बीना

