एक दौर था जब कविता कवि की पहचान बनती थी एक कवि अपनी सबसे लोकप्रिय कविता के नाम से जाना जाता था अब ज़माना थोड़ा बदल गया है अब कवि अपनी कविता को पहचान दिलाने के लिए के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाता दिखाई पड़ता है। एक अच्छी कविता लिखी जाए या न लिखी जाए पर प्रचार तंत्र की व्यवस्था पहले से ही तय हो जाती है। बैकग्राउंड में कौन सी आकर्षक इमेज लगानी है बैकग्राउंड में कौन सी आकर्षक और गहरी संगीत लगानी है।रील, फोटोशूट, पोस्टर डिजाइन या यूं कहूँ कि इस स्तर का आडंबर कि कोई नेता भी देखकर शरमा जाए, उसे लगे कि चुनाव के दौरान इस स्तर का प्रयास तो मैं भी कभी नहीं कर पाया। साफ तौर पर कहूं तो शब्दों से अधिक प्रचार का शोर सुनाई पड़ता है।
यह कहना गलत होगा कि सोशल मीडिया ने केवल नुकसान ही किया है। सच तो यह है कि इसी सोशल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से ही अनेक प्रतिभाशाली लेखकों और कवियों को पाठकों तक पहुँचाया गया है। जिन लोगों को मंच नहीं मिल पाता था, उन्हें सोशल मीडिया ने पहचान दिलाई है। लेखक और पाठक के बीच की दूरी कम करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
दरअसल गौर करने वाली बात ये है कि जब भी हम सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर कोई रचना पढ़ते या देखतें हैं तो एक औसत सी रचना भी हमें प्रभावित कर जाती है क्योंकि उसके पीछे जो गहरी संवेदनशील बैकग्राउंड म्यूजिक होती है वो हमारे मन को इतनी गहराई में ले जाती है कि उस म्यूजिक के भरोसे हम उस रचना को भी गहरा समझ लेते हैं। इसी तरह बैकग्राउंड इमेज भी इस तरह लगाया जाता है मानो कि आर्टिस्ट ने वो इमेज सिर्फ उस रचना के लिए क्रिएट किया है।यदि इन सब चीज़ों से आप बच भी जातें हैं तो बची कुची कसर कमेंट सेक्शन में कमेंट करने वाले लोग पूरा कर देते है वो उस रचना को अपने पैमाने में रखकर इतनी तारीफ कर देते हैं कि पाठक स्वयं अपनी समझ पर संदेह करने लगता है और उसे लगता है कि शायद वह रचना की गहराई को समझ नहीं पा रहा, जबकि वास्तविकता यह हो सकती है कि रचना साधारण ही हो। हो सकता है उस औसत दर्जे के कॉन्टेंट को हम अपने समझ से ऊंचा मान लें।
इसके साथ ही आजकल एक ट्रेंड और भी चर्चित है जहां कॉमेडी और पोएट्री को एक साथ लाया जाता है और उसे “पॉमेडी” का नाम दे दिया जाता है और उसके बाद जो सड़क छाप शायरियां होती है जिसका कोई हाथ पैर नहीं होता उन्हें लगता है तीन तुक वाले शब्दों को मिलाना ही तो है और काम हो गया। हालांकि ये भी मनोरंजन का एक तरीका हो सकता है जब तक वहां अश्लीलता हावी न हो। क्योंकि ये सब नेशनल प्लेटफॉर्म में होता है और इसके रचनाकार वर्ल्ड टूर भी कर रहे हैं अपने इन्हीं कॉन्टेंट के साथ।
गौर करने वाली बात तो ये भी है कि दर्शक व पाठक भी उसे उसी गंभीरता से ग्रहण करते हैं, मानो साहित्य का वास्तविक स्वरूप यही हो। जब सत्रह-अठारह वर्ष का युवा ऐसी प्रस्तुतियों को कविता का मानक समझकर बड़ा होगा, तो स्वाभाविक है कि उसे यही साहित्य प्रतीत होगा। फिर उसे न पुस्तकों की आवश्यकता होगी, न परंपरा की, न किसी उस्ताद के संगति की।ऐसे कॉन्टेंट देखने के बाद तो उन्हें यही लगेगा कि बस “यही तो है साहित्य”! इतना ही तो करना होता है।
यहां प्रश्न ये नहीं कि प्रचारतंत्र का पहिया कहां तक ले जाना है प्रश्न ये है कि लोकप्रियता का केंद्र क्या होना चाहिए? कवि का व्यक्तित्व, प्रस्तुतिकरण या स्वयं कविता?

