संपादकीय लेख में आज संपादक चैतन्य गोपाल की कलम से “सार्थक जीवन की ओर” पर नज़र डालते हैं।
“सार्थक जीवन की ओर” शीर्षक न केवल एक शीर्षक है बल्कि यह एक यात्रा है जो किसी व्यक्तित्व द्वारा की जाती है। सार्थक जीवन एक उद्देश्यपूर्ण प्रयास है। हालांकि जिसके सफल या असफल होने का कोई निश्चित मानक नहीं है, पर इसके सार्थक होने में असफलता बाधा नहीं बन पाती। अतीत के पन्नों को अगर खंगाला जाए तो हम पाएंगे कि सामान्यतः जीवन की सार्थकता सामाजिक क्षेत्रों में वरीयता पा लेने या धार्मिक अथवा आध्यात्मिक कर्मों में प्रवृत्त साधकों की तृप्त भावनाओं में निहित होती थी, किंतु वर्तमान परिदृश्यों में जीवन के सार्थक होने का क्षेत्र अपना विस्तार कर चुका है। हालांकि हर क्षेत्र की अपनी चुनौतियां है, अपनी ही रूपरेखाएं और अपनी ही सीमाएं हैं। नवाचार प्रयास और सफलता के साथ- साथ “सार्थकता” में भी प्रवेश कर चुकी है अतः इसके मायनों ने भी खुले आसमान में अपना विस्तार पा लिया है, उद्देश्यों में वृद्धि हुई है । मनुष्य एक लक्ष्योन्मुखी जीव है। सतत् प्रयास इसकी सहज प्रवृत्ति तो है लेकिन लक्ष्य सिद्धि केवल इस बात पर निर्भर नहीं कि केवल अंतिम प्रयास जो सफल हुआ हो वही महत्वपूर्ण है और शेष नहीं। कथन का तात्पर्य यह है, कि अंतिम और सफल प्रयास से पहले न जाने कितने ही और असफल प्रयास किए गए होंगे। इन सभी असफल प्रयासों में एक के बाद एक कई कमियां क्रमशः सफलता प्राप्ति के बढ़ते क्रम में हुई होंगी जिसके परिणामस्वरूप हर बार ही पिछली कमियों को पूरा करते सफलता का अभीष्ट रूप प्राप्त हुआ होगा। इस तरह हर असफल प्रयास भी एक के बाद एक निदानात्मक स्वरूप में हो प्रतीत हुई है। विरोधाभास संभव है,लेकिन जीवन की यात्रा और उस यात्रा के सफल या सार्थक होने या सार्थक नहीं होने का समीकरण भी कुछ ऐसा ही है जहां निरर्थक कुछ भी नहीं है। जीवन में लक्ष्य निर्धारित करना और उसके लिए प्रयासरत रहना ही सार्थक होना है। उदाहरण के तौर पर मेरी एक स्वरचित कविता के रूप में आज के एक युवा के मन की बात करते हैं और जानते हैं कि उसकी क्या चुनौतियां हैं जीवन की सार्थकता के लिए :-
” मैं
परीक्षार्थी हूं
कभी छात्र हुआ करता था
अब बेरोजगार परीक्षार्थी हूं..
दुनिया की चकाचौंध से अलग
अपने गांव,
घर,
माता-पिता, भाई बहन
और स्वयं से ही दूर
दूर किसी अनजान शहर की
किसी अनजान गली में
10×10 का एक तंग कमरा
एक अलग ही दुनिया
जहां मैं अपनी महत्वाकांक्षा
माता-पिता की उम्मीद
समाज की उलाहना
और मेरे सफल होने की चाह में राह देखती
मेरी प्रेयसी…तथा इन सब के उपरांत
निरंतर असफलताओं के बोझ में दबा हुआ मैं
बेहतर कल के लिए सब भुला देता हूं
रोआंसा हो के मुस्कुरा देता हूं
कि महज कुछ अंक मेरी सामाजिक गरिमा को
परिभाषित करने लग जाते हैं
मेरी असफलता चर्चा का विषय बन जाती है
इन सब के बीच
मेरी जी तोड़ मेहनत कहीं लुप्त हो जाती है
रात – रात भर जाग कर
मेरी आंखों के नीचे बने रात्रि के वो काले अंश कोई नहीं देख पाता
और मेरी भावनाएं
मेरी कुर्सी में रखे उस तकिए सी दब गई है
जिसमें अब कोई भी संचार नहीं
मन ही मन मैं अनंत बार हारता हूं
मेरे अंदर का योद्धा परंतु
वह समर्पण नहीं करता
टूटता है पर नहीं मरता
विजेता बनूंगा
स्वप्न ये सोने नहीं देता
मैं जानता हूं की जरूर जीतूंगा..
स्वप्न देखता परीक्षार्थी हूं
बेरोजगार परीक्षार्थी हूं..। “
तात्पर्य ये है कि प्रयास ही एक मात्र चाबी है उस ताले की जो अन्ततः सफ़लता से सरोकार कराता है। विफलता के भय से आत्मसमर्पण न किया जाए वरन् संपूर्ण समर्पण ज्ञान के लिए हो तो निष्कर्षतः पाएंगे कि प्रयास मात्र ही सार्थकता है..
यदि आप प्रयासरत हैं अर्थात् आपका जीवन सार्थक होने की ओर है…

सार्थक जीवन की ओर


1 Comment
Keep the spirit up .. Loads of blessings, today and always 😊😊❤️