मैं कई बार अपने शव को सीने से लगाकर रोती हूँ,कई बार नाकामयाबी का कफ़न उसे ओढ़ाती हूँ।कई बार मुझे उसे समझाना पड़ता है मृत्यु एक शरीर में केवल एक बार नहीं होती,मनुष्य अपने जीवन में अनेक बार मरता है।संसार मांस का भूखा है,और कई बार अपनी ही चाहत के क़त्ल का गवाह बनना पड़ता है।मनुष्य की कल्पना समस्त संभावनाओं का मानचित्र नहीं बना सकती।मेरा शव मुझसे बहुत कुछ कहता है”इतना कठोर जीवन बोया ही क्यों जाता है?जब अंततः साथ कुछ जाना नहीं,तो यह ढोंग हर श्वास पर पिरोया ही क्यों जाता है?अरे, गुमनामी भली इस मायावी संसार के मोह से।जब अंत में मोक्ष की चौखट पर सब त्याग ही देना है,तो यह ख़ज़ाना समेटा ही क्यों जाता है?”कई बार प्रश्नों की चपेट में आकर मैंने अपनी ही चाहत पर संदेह किया है।मन इस मायावी संसार का वज़ीर है,और संसार से मुक्ति जीवन के शतरंज में जीतकर नहीं,हारकर मिलती है।लगाओ वज़ीर दाँव पर,और हार जाओ, जीवन।माया एक मधुर मंच है।तुम पर्दे के पीछे खड़े सब कुछ देख रहे हो।सुनो यह विजय-पताका,यह गूँजती तालियाँ,जो हर किसी को एक नाम दे रही हैं।देखो,स्वाँग रचने वाले और देखने वाले,दोनों समान रूप से नग्न हैं।देखो कैसे माया इन्हें मोहित कर रही है,देखो कैसे जीवन की मिठास का लोभ इनकी जिह्वा पर नृत्य कर रहा है।और तुम,तुम वैसे ही खड़े हो जैसे वास्तव में हो।तुमने सत्य का विष पिया है,तुम्हारे मस्तक पर सजी है यह भस्म।कितनी निष्ठुर, कितनी निर्मल सच्चाई है इस नग्नता में कि तुम कुछ नहीं हो,तुम्हारा कोई नाम नहीं।मनुष्य मूर्ख है,जो बिना जाने चल पड़ता है।उसे दिखता ही क्या है?स्वाँग, रूप, सौंदर्य, वैभव।भ्रम तोड़ने का यह सबसे कठिन मार्ग है।और अब तुमने एक और प्राण त्याग दिया है।भस्म सजाओ मस्तक पर, चलो।ज्ञान का दीप प्रज्वलित करो।संसार को बताओ जीवन ही दुःख है।जो दूर नहीं किया जा सकता,वही दुःख है।और जब जीवन ही दुःख है,तो यह पग किसके पीछे भाग रहे है?यह संसार पीड़ा का आधार है।यदि कुछ चंद खुशियाँ जी भी ली तुमने,तो समझ लो एक नया दुःख तैयार है।एक नया दुःख तैयार है।अब शव मौन है,पर उसके चक्षु प्रमाण हैं।अश्रु की धारा,कफ़न की नमी,मेरी गुहार एक पुकार है।यदि मैं सत्य जान भी लूँ,तो उसकी पुष्टि कौन करेगा?कौन जीतता है?कौन हारता है?और प्रमाण चुनने का अधिकार सदा विजेता को ही क्यों मिलता है?जब रक्त दोनों का बहता है,तो रणभूमि में पताका सिर्फ़ एक का ही क्यों लहराता है?मुझे तालियों की आवश्यकता नहीं।मैं स्वांग से संन्यास ले चुकी हूँ।पर आज भी अपने शव को सीने से लगाकर रोती हूँ।कितना पा लूँ अपने लक्ष्य को कि उसे पाकर पूर्ण हो जाऊँ? मुस्कराऊँ किस बात पर?कि कर्म करती गई,करती गई।कर्तव्य निभाती गई,निभाती गई।प्रश्नों से दूर होती गई,दूर होती गई।माया के रेशमी धागों को लपेटते-लपेटते मैं स्वयं रेशम-कीट बनती गई।सबने प्रशंसा की,और मैं स्वयं को ढूँढ़ ही न पाई।स्वयं को जान ही न पाई।मेरे शव खड़े हैं पर्दों के पीछे।शतरंज की बिसात से उतरकर सत्य की भूमि पर।उन्हें पता हैवे कहाँ हैं।और मैं,मैं जो जानती हूँ कि यह संसार माया है,फिर भी उसकी गलियों में भटक रही हूँ।शायद यही मनुष्य का स्वभाव है।पहले माया को खोजना,फिर उससे मोह करना,फिर उसके टूटने पर विलाप करना,और अंततः उसी के अवशेषों में सत्य की आहट सुनना।कौन जाने?शायद सत्य तक पहुँचने का मार्ग भी माया की देहरी से होकर ही जाता हो।क्योंकि जिसने कभी मोह नहीं किया,वह त्याग क्या जाने?जिसने कभी खोया नहीं,वह वैराग्य क्या जाने?पर इतना जानती हूँ माया पथ हो सकती है,गंतव्य नहीं।विश्राम यदि कहीं है,तो सत्य में है।और जब अंतिम बारअपने शव को सीने से लगाऊँगी,मैं उससे प्रश्न नहीं करूँगी।मैं केवल देखूँगी कितनी बार मरी थी मैं उन चीज़ों के लिए जो कभी मेरी थीं ही नहीं।और तब,मौन ही उत्तर होगा।-
कल तक व्याकुल थी आज मौन हुं एक और कंन मेरा सत्य के करीब हैं

