आज की कविता में प्रस्तुत है “गतिशील गंतव्य”
कवयित्री : बीना, सूरत (गुजरात)
फिर से एक बार ..
भगवान बुद्ध और अंगुलिमाल का आमना सामना हुआ।
कहां पर लेकिन ?
कोई घने जंगल में ?
नही .. मेरे भीतर ही
दोनो मौजूद रहते है
अक्सर बातें करते है
तुमने बुद्ध का एक बाहरी कवच बना रखा है बस .. हल्की सी खरोच , आहट से ये टूट जाता हैउस के अंदर तो आग जैसा मैं ही रहता हूंअंगुलिमाल ने कहा
कहो मुझे .. खुले किसी जंगल में
तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व किस रूप में
प्रकट होगा
बुद्ध या बुद्ध की खाल
धारण किया हुआ अंगुलिमाल
सत्य की एक आवाज़ गूंजने लगी मेरे भीतर
अंगुलिमाल अंगुलिमाल
फिर से एक आवाज़ सुनी मैंने
ठीक है .. तुम्हारे भीतर की अग्नि में
सब झोंक दो .. जो है वो , नही है वो भी
तथागत का चेहरा उभर रहा है
मुझ में , मुझ से
……………………


1 Comment
बहुत बहुत शुक्रिया चैतन्य 😊 इतना सम्मान देने के लिए, सुंदर प्रस्तुति के लिए और बहुत सुंदर ब्लॉग के लिए। बहुत बहुत शुभकामना 😊❤️