आवा वो दीदी आवा गा सियान,
सब जुर मिल के मनाबो हरेली के तिहार
सब रीत भुलागे दुनियां दारी में
नई ये कोनो कखरो चिन्हारी में
नंदाय तिहार ल फेर जगाबो,
गांव गली में अभियान चलाबो

बांस काटे बार जंगल जाय,
घर में बैठ के सब गेड़ी बनाए
गली खोर म गेड़ी के रेला लगाए
चढ़े गेड़ी त सब के मन ल भाय

नांगरिहा हर औजार ल सुमिरत ,नांगर के धार ल पूजे
बतर बुलक गे बयासी अगोरत, नांगर के नहना हर पूछे
खार में पानी के धार बोहागे ,
अन्नपूर्णा के अछरा हर हरियागे
हमर हरेली तिहार हर आगे

होगे बयासी बादर छागे, गिरीस पानी नांगर धोवागे
अरे नांगरिहा थोकुन तहु थिरिया ले….
उठत बीहीनिया धो ले रांपा, अऊ धो ले गैती कुदारी
लगा के बंदन जला के दिया, देवव हाथा बारी बारी

येखर पूजा करो सब मिल के नर नारी
इही हरे हमर छत्तीसगढ़ महतारी
धोवव नांगर अऊ मचव गेड़ी
आगे हरेली… आगे हरेली….

1…हमारे समस्त छत्तीसगढ़िया भाइयों, बहनों एवं बुजुर्गों से निवेदन है कि आप सभी आइए। हम सब मिलकर अपनी छत्तीसगढ़ी परंपरा के पावन पर्व हरेली को हर्षोल्लास के साथ मनाएंगे।
क्योंकि आज सभी लोग दुनिया के कामों में व्यस्त होकर अपनी रीति-रिवाज और परंपराओं को भूल गए हैं। कोई किसी को पहचानता तक नहीं, सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त हैं।
जो त्योहार लोगों के दिलों से निकल गया है, उसे हम फिर से जीवित करेंगे। हम गाँव-गली, मोहल्ले-मोहल्ले जाकर अभियान चलाएंगे और लोगों को छत्तीसगढ़ी परंपरा के महत्व के बारे में बताएंगे।

2…गाँव के लोग पास के जंगल में जाकर वहाँ से बाँस की लकड़ी लाते हैं और फिर उसी लकड़ी से गेड़ी बनाते हैं, जिस पर गाँव के लड़के चढ़ते हैं। यह दृश्य बहुत मनोरम होता है।
गाँव का किसान खेती के काम आने वाले अपने औजारों को देख रहा है और खेत में उपयोग होने वाले औजारों पर धार चढ़ा रहा है।
फिर वह सोच रहा है कि खेतों की सफाई का समय निकल गया।

3..बियासी हो गई, अब खेत में चलने वाला नाँगर भी धो लिया।
अरे किसान भैया, अब तुम भी थोड़ा रुककर आराम कर लो।
*सुबह उठते ही तुम्हें अपने खेती-किसानी में उपयोगी औजारों की साफ-सफाई भी तो करनी है।
उनमें दिया जलाकर, टीका लगाकर उनकी पूजा भी करनी है।
आप घर के सभी लोग इनकी पूजा-अर्चना करें,
क्योंकि यही हमारी छत्तीसगढ़ महतारी है।
यह हरेली त्योहार हम समस्त छत्तीसगढ़वासियों की पहचान और कृषि का पर्व है।

उद्देश्य

यह कोई त्योहार मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान और हमारी परंपरा है, जिसे आज के लोग समय के साथ-साथ भूलते जा रहे हैं।

लोग कहते हैं कि हम अब आधुनिक होते जा रहे हैं, तो मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या अपनी परंपरा और संस्कृति को भूलकर आगे बढ़ना सही है? संस्कृति और परंपरा भूलने या दिखाने की चीज नहीं है, यह तो अपनाने का गुण है।

आज समाज के युवा गलत आदतों और बुरी संगतों में लिप्त हैं, तो क्या हमें यही आधुनिकता चाहिए?

अगर हम समाज, परंपरा और संस्कृति के साथ चलकर आगे बढ़ें, तो हम उस समाज की ओर जाएँगे जिसकी कल्पना हम अपने विचारों में करते हैं।

समाज के त्योहार हमें कुछ नया सिखाते हैं, वे हमें आपस में जोड़ना सिखाते हैं और लोगों को प्रकृति, जीव-जंतुओं से जोड़कर रखते हैं।

Share.

1 Comment

Leave A Reply