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    पर्व का स्वाद : डॉ सरोज दुबे “विधा”

    sahitya36garh 01By sahitya36garh 01June 19, 2026Updated:June 19, 2026 आज की कविता No Comments1 Min Read
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    श्यामू शहर के एक निर्माण साइट पर मजदूरी करता था। सुबह से शाम तक खून -पसीना बहाने के बाद भी उसकी मजदूरी इतनी नहीं होती थी कि परिवार भर पेट खाना खा सके। त्योहारों का मौसम था। शहर की गलियाँ रोशनी से जगमगा रही थी, मिठाइयों की दुकानों पर भीड़ उमड़ रही थी लेकिन श्यामू की झोपड़ी में चूल्हा दो दिनों से ठंडा पड़ा था।
    उसकी पत्नी राधा बच्चों को बहला रही थी,–“कल कुछ अच्छा बना दूँगी।”पर उसे खुद नहीं पता था कि आटा आएगा कहाँ से। छोटा बेटा सोनू सामने वाले घर में पटाखे और मिठाइयाँ देखकर बोला,–बाबा हमारे घर पर्व कब आएगा।”
    श्यामू के पास कोई उत्तर नहीं था। उसने जेब टटोली सिर्फ दस रूपए थे। आँखों में नमी उत्तर आई।पास के मंदिर में प्रसाद बाँटा जाने लगा।वह बच्चों को लेकर वहाँ पहुँचा। बच्चों नें कई दिनों के बाद पेट भरकर खिचड़ी खाई। सोनू मुस्कुराकर बोला,–बाबा आज तो हमारा भी त्योहार है।”श्यामू नें आसमान की ओर देखकर भगवान को आभार व्यक्त किया। उसे लगा भूखे इंसान के लिए पर्व का असली स्वाद केवल पेट भर भोजन और अपनों की मुस्कान में ही छिपा होता है।

    डॉ. सरोज दुबे ‘विधा’

    वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर डॉ .सरोज दुबे ‘ विधा ‘

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