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    मंच का मापदंड : ✍️ डॉ. सरोज दुबे “विधा”

    sahitya36garh 01By sahitya36garh 01May 22, 2026Updated:May 22, 2026 आज की कविता No Comments2 Mins Read
    साभार - डॉ सरोज दुबे "विधा"जी
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    शहर के सांस्कृतिक भवन में आज कवि सम्मेलन था। बाहर बड़े -बड़े पोस्टर लगे थे। “प्रसिद्ध कवियों की महफ़िल” भीतर मंच सजा था और कुर्सियाँ लगभग भर चुकी थीं।श्यामलाल जो वर्षों से कविता लिख रहे थे, धीरे -धीरे जाकर पीछे की पंक्ति में बैठ गए। उन्हें छंद, शब्द और भाव की शुद्धता पर भरोसा था, लेकिन आजकल मंचो पर उनकी कोई पूछ नहीं थी।

    कार्यक्रम शुरू हुआ सबसे पहले एक कवि मंच पर आए।उन्होंने कविता कम चुटकुले अधिक सुनाए। लोग ठहाके लगाने लगे और तालियों की गूँज से हॉल भर गया। उन्हें फूलों की हार से सम्मानित किया गया।श्यामलाल चुपचाप देखते रहे। उसके बाद कई कवि आए। किसी नें हास्य सुनाया किसी नें तुकबंदी वाले आसान गीत।

    असली कविता, गहरा भाव, और शिल्प कहीं छूटते जा रहे थे।बीच में आयोजक मंच पर आए और बोले, –“आज के लोकप्रिय कवियों को विशेष सम्मान मिलेगा जिन्होंने दर्शकों का दिल जीता है।”सम्मान उन लोगों को मिला जिनकी लोकप्रियता अधिक थी ज्ञान कम।श्यामलाल के बगल में बैठे एक वृद्ध कवि नें धीमे से कहा, –“अब मंचो पर कविता नहीं भीड़ का मनोरंजन बिकता है।” श्यामलाल ने उदास स्वर में कहा -“मंच का मापदंड बदल गया है।”

    डॉ. सरोज दुबे ‘विधा’ |रायपुर (छत्तीसगढ़)

    picture credit ,: Dr. saroj dubey “vidha”

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