पुस्तक – बहादुर कलारिन|लेखक – श्री भागवत जायसवाल (लेखक व प्रशासनिक अधिकारी)
समालोचक : रमेश सारथी “गौर”, रायगढ़(छत्तीसगढ़)
मेरी नज़र से— एक अद्भुत साहित्यिक यात्रा”बहादुर कलारिन, श्री भागवत जायसवाल की चर्चित कृति, पाठक को साहस, संघर्ष और स्त्री-अस्मिता के एक जीवंत संसार में ले जाती है।बहादुर कलारिन भारतीय लोकजीवन की एक साहसी, स्वाभिमानी और संघर्षशील नारी के रूप में स्मरण की जाती हैं।
छत्तीसगढ़ की पावन धरा को अपने शौर्य और पराक्रम से सिंचित करने वाली, कलार समाज का पौराणिक इतिहास ,देवी स्वरूपा वीरांगना माता बहादुर कलारिन ग्राम सोरर प्राचीन सरहरगढ़, बालोद में जन्म लेकर न केवल ग्रामीण अंचल का मान बढ़ाया बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ को भारतवर्ष में सबसे ऊँचा स्थान दिलाया।
साधारण परिवेश में जन्मी बहादुर कलारिन ने जीवन की कठिन परिस्थितियों, सामाजिक चुनौतियों और विपरीत हालातों के बीच अदम्य साहस, बुद्धिमत्ता और आत्मविश्वास के बल पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।अन्याय के सामने कभी न झुकना, अपने सम्मान और सत्य के लिए डटकर खड़े रहना, तथा विपरीत परिस्थितियों को अपनी शक्ति में बदल देना—यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताएँ रहीं। अपने असाधारण साहस और नेतृत्व क्षमता के कारण वे जनमानस में “बहादुर कलारिन” के नाम से प्रतिष्ठित हुईं और आज भी नारी-सशक्तिकरण, स्वाभिमान और संघर्ष की प्रेरणा के रूप में याद की जाती हैं।इतिहास जब अपने पन्ने खोलता है, तो उसमें कुछ नाम केवल पढ़े नहीं जाते—वे महसूस किए जाते हैं। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो समय की धूल में दबकर भी अपनी आभा नहीं खोते। वे लोककथाओं की तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहते रहते हैं—कभी गीत बनकर, कभी किस्सों में, तो कभी किसी बूढ़ी दादी की स्मृतियों में। बहादुर कलारिन ऐसा ही एक नाम है—एक स्त्री, जो केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि साहस, आत्मसम्मान और अदम्य जीवटता का दूसरा नाम है।जब मैं बहादुर कलारिन के बारे में सोचता हूँ, तो मेरे सामने कोई साधारण स्त्री नहीं उभरती। मेरे सामने एक ऐसी छवि जन्म लेती है, जिसके माथे पर संघर्ष की रेखाएँ हैं, आँखों में अंगारों-सी चमक है, और कदमों में वह दृढ़ता है, जिसे देखकर पहाड़ भी रास्ता छोड़ दें।वह उस दौर की स्त्री थी, जब समाज ने औरतों के हिस्से में चूल्हा, चौका और चारदीवारी लिख दी थी। जब उनके सपनों की उड़ान को परंपराओं की रस्सियों से बाँध दिया जाता था। लेकिन कुछ आत्माएँ जन्म ही इसलिए लेती हैं कि वे सीमाओं को चुनौती दें। बहादुर कलारिन उन्हीं आत्माओं में से एक थी।कहते हैं, साहस कभी वंश से नहीं मिलता—वह परिस्थितियों की आग में तपकर बनता है। बहादुर कलारिन भी जीवन की उन्हीं भट्टियों में तपकर कुंदन बनी थी। उसने दुख देखे, अभाव देखे, समाज की तिरछी निगाहें देखीं, लेकिन उसने हारना नहीं सीखा।उसकी कहानी किसी महल में जन्मी राजकुमारी की कहानी नहीं है। उसकी कहानी मिट्टी की उस बेटी की कहानी है, जिसने अपने पैरों में धूल बाँधी और अपनी हिम्मत से इतिहास के दरवाजे पर दस्तक दी।कल्पना कीजिए—एक गाँव की पगडंडी है।
शाम उतर रही है। दूर कहीं बैलों की घंटियाँ बज रही हैं। चूल्हों से उठता धुआँ आसमान में घुल रहा है। और उसी पगडंडी पर एक स्त्री सीना ताने चल रही है। उसके कदमों में भय नहीं, निर्णय है। उसकी आँखों में आँसू नहीं, आग है। वह है—बहादुर कलारिन।उसने शायद तलवार कम उठाई होगी, लेकिन अपने आत्मसम्मान को कभी झुकने नहीं दिया। उसने युद्ध मैदानों में सेनाएँ नहीं चलाई होंगी, लेकिन जीवन के हर मोर्चे पर जीत हासिल की। और सच पूछा जाए तो जीवन का युद्ध किसी रणभूमि से कम भी कहाँ होता है?
एक कवि की दृष्टि से देखूँ, तो बहादुर कलारिन कोई स्त्री नहीं—वह एक कविता है। ऐसी कविता, जो कागज़ पर नहीं, लोगों के दिलों पर लिखी गई है। वह लोकगीतों की धुन है, खेतों में बहती हवा का स्वर है, नदी की धारा में छिपा हुआ आत्मविश्वास है।वह कहती है—”मत आँको मुझे मेरे वस्त्रों से,मेरे हाथों की लकीरों से,मैं वो कहानी हूँ,जिसे समय ने अपने खून से लिखा है।”बहादुर कलारिन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसने केवल अपने लिए नहीं जिया। उसका संघर्ष व्यक्तिगत नहीं था; वह सामूहिक था। वह जानती थी कि अगर एक स्त्री खड़ी होती है, तो उसके पीछे आने वाली कई पीढ़ियों की रीढ़ सीधी हो जाती है।आज जब हम आधुनिकता, अधिकार और समानता की बातें करते हैं, तब बहादुर कलारिन जैसे चरित्र हमें याद दिलाते हैं कि इन शब्दों की नींव बहुत पहले किसी गुमनाम संघर्षशील स्त्री ने रखी थी।वह इतिहास की किताबों में चाहे जितनी जगह पाए या न पाए, लेकिन लोकमानस में उसका स्थान अमर है। क्योंकि कुछ लोग मरते नहीं—वे प्रेरणा बन जाते हैं।और बहादुर कलारिन…सच कहूँ तो वह केवल एक नाम नहीं—वह मिट्टी की वह खुशबू है,जो बारिश के बाद और गहरी हो जाती है।वह साहस की वह लौ है,जो आँधियों से लड़कर और उजली हो जाती है।और वह स्त्रीत्व की वह परिभाषा है,जिसे शब्दों में नहीं, केवल महसूस किया जा सकता है।-
✍️ रमेश सारथी गौर, रायगढ़(छत्तीसगढ़)

लेखक परिचय :
रमेश सारथी “गौर”
जन्म तिथि – 07/06/1999
ग्राम – बिंजकोट, रायगढ़,छत्तीसगढ़
शैक्षिक योग्यता:- एम. एस. सी. वनस्पति शास्त्र
साहित्यिक सम्मान :-
(01)- गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड – भारत का छंदबद्ध संविधान (साझा संकलन) 15, जून 2024 (हिंदी भवन,न्यू दिल्ली।)(02) गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड – वृहद हिंदी व्याकरण (छंदबद्ध) 13 मई 2025 वृंदावन हॉल रायपुर।(04) भारतीय पुस्तक न्यास (NBT) द्वारा उत्कृष्ट लेखक सम्मान (05) उत्कृष्ट स्थान सम्मान भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा किताब :-(01) कल्चर एंड डेमोक्रेसी ऑफ इंडिया 25 अप्रैल 2025(Amazon Kindle Book Store)

