लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि नेताओं पर हमले हो रहे हैं, बल्कि यह है कि समाज की प्रतिक्रिया पीड़ित के नाम से तय होने लगी है। यदि थप्पड़ हमारे पसंदीदा व्यक्ति को पड़े तो यह लोकतंत्र पर हमला कहलाता है। लेकिन यदि यही थप्पड़ किसी विरोधी विचार वाले व्यक्ति को लगे, तो यह मज़ाक, मीम और मनोरंजन का विषय बन जाता है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर अभिजीत दीपके के साथ हुई घटना में यही देखा गया। कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे थे, जबकि कुछ लोग इस पर ठहाके लगा रहे थे। यही स्थिति तब भी रही, जब अरविंद केजरीवाल पर सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान हमले हुए। तब भी समाज दो हिस्सों में बंट गया। एक भाग इसे लोकतंत्र के लिए खतरा मान रहा था, जबकि दूसरा भाग इसे “कर्मों का फल” कहकर सही ठहरा रहा था.
सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में न्याय और नैतिकता का स्थायी मानदंड बचा है, या फिर सब कुछ हमारी राजनीतिक पसंद-नापसंद पर निर्भर हो गया है?
किसी व्यक्ति के विचार आपको पसंद नहीं आ सकते। आप उसके वक्तव्यों से असहमत हो सकते हैं। आप उसकी राजनीति, भाषा, व्यवहार और दृष्टिकोण की आलोचना कर सकते हैं। लोकतंत्र आपको यह अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार आपको असहमति का उत्तर हाथ उठाकर देने का नहीं देता।
दुर्भाग्य से आज का सार्वजनिक विमर्श विचारों की लड़ाई नहीं, बल्कि व्यक्तियों की लड़ाई बन गया है। लोग तर्कों का उत्तर तर्कों से नहीं, बल्कि गालियों, ट्रोलिंग और कभी-कभी शारीरिक हिंसा से देने लगे हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक है कि समाज का एक बड़ा वर्ग इस हिंसा को अपने राजनीतिक नजरिए से देखता है।
यदि अभिजीत दीपके पर हमला होता है, तो कुछ लोग कहते हैं—”अच्छा हुआ।” यदि केजरीवाल पर हमला होता है, तो दूसरा वर्ग कहता है—”ठीक हुआ।” दोनों पक्ष यह भूल जाते हैं कि आज जिस हिंसा पर वे ताली बजा रहे हैं, वही कल उनके पसंदीदा नेता, लेखक, पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है।
लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को हराने का तरीका थप्पड़ नहीं, बल्कि तर्क है। किसी विचार को पराजित करने का तरीका हमला नहीं, बल्कि बहस है। किसी नेता को अस्वीकार करने का तरीका हिंसा नहीं, बल्कि मतपत्र है। जब समाज इन बुनियादी सिद्धांतों को भूलने लगता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलने लगता है।
सोशल मीडिया ने इस समस्या को बढ़ा दिया है। आज किसी भी हिंसक घटना के कुछ मिनटों में मीम्स बनने लगते हैं, वीडियो वायरल होते हैं और लोग घटना की गंभीरता पर चर्चा करने के बजाय यह तय करने में लग जाते हैं कि पीड़ित “अपना” है या “पराया”। नैतिकता अब सार्वभौमिक नहीं रही; वह राजनीतिक पहचान की बंधक बनती जा रही है।
याद रखें, थप्पड़ सिर्फ एक व्यक्ति के गाल पर नहीं पड़ता। यह कानून के शासन, लोकतांत्रिक मर्यादा और संवाद की संस्कृति पर भी पड़ता है। यदि हम किसी से असहमत हैं, तो हमें उसके विचारों का विरोध करना चाहिए, उसके तर्कों को चुनौती देनी चाहिए और उसकी आलोचना करनी चाहिए। लेकिन जब हम हिंसा को स्वीकार कर लेते हैं, तो हम अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने लगते हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि थप्पड़ अभिजीत दीपके को लगा या केजरीवाल को। प्रश्न यह है कि क्या हम सिद्धांतों के साथ खड़े हैं या सिर्फ अपने पसंदीदा लोगों के साथ। यदि हिंसा गलत है, तो वह हर व्यक्ति के खिलाफ गलत है। और यदि किसी एक मामले में इसे सही ठहराया जा सकता है, तो यह कल किसी भी मामले में सही ठहराया जा सकेगा।
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों में नहीं, बल्कि असहमति के प्रति हमारे व्यवहार में है। जिस दिन हम यह तय करेंगे कि थप्पड़ किसी भी व्यक्ति को न लगे, उसका समर्थन नहीं किया जाएगा, उसी दिन लोकतंत्र और मजबूत होगा। उससे पहले नहीं।

